Sunday, December 19, 2021

ज़िन्दगी की पाठशाला #13 - दीपक



मेरे घर से कुछ दूरी पर एक मंदिर है | मैं हर शनिवार को वहाँ शनिदेव के मंदिर में दीपक जलाने जाता हूँ | कल शाम जब मैं मंदिर में पहुँचा, तब वहाँ श्रद्धालुओं की थोड़ी भीड़ लगी हुई थी | कुछ देर लाइन में लगने के बाद मेरा नंबर आया | जब मैं शनिदेव के श्री विग्रह के सम्मुख दीपक जलाने लगा, तो मैंने देखा कि वहाँ पहले से बहुत सारे दीपक जल रहे थे और दीपक रखने वाला स्थान लगभग भर चुका था | तभी एक व्यक्ति ने अचानक बुझे हुए दीपकों को उठाकर एक कोने में फेंकना शुरू कर दिया | उसके ऐसा करने से तुरंत नये दीपक जलाने के लिए रिक्त स्थान बन गया | मैं उन्हें देखकर थोड़ा मुस्कुराया और शनिदेव की पूजा अर्चना करने लगा |

जब मैं मंदिर से वापिस अपने घर की ओर आ रहा था, तब मंदिर की घटना ही मेरे दिमाग में चल रही थी | जैसा कि मैं हमेशा कहता हूँ कि ज़िन्दगी हर पल हमें कुछ नया सिखाती है, पर सीखता वही है जो सूक्ष्मता से घटनाओं का अवलोकन करता है | जब इस घटना को मैंने ज़िन्दगी से जोड़ कर देखा तो मुझे कुछ बातें सीखने को मिलीं :

1. दीपक जब तक जलता है, वह दूसरों को रोशनी देता रहता है | इसी तरह हमें भी प्रयास करना चाहिये कि हम जब तक इस दुनियाँ में रहें, दूसरों की ज़िन्दगी में रोशनी करते रहें | 

2.  जब तक दीपक जलता रहता है, उसका महत्व बना रहता है | जब दीपक बुझ जाता है, तब वह महत्वहीन एवं अर्थहीन हो जाता है | इसलिए हमें भी अपने परिवार, ऑफिस, समाज और देश के प्रति अपने कर्तव्यों का निर्वहन करते रहना चाहिये | जब तक हमारी उपयोगिता बनी रहेगी, तब तक हमारा महत्व भी बना रहेगा |

3. जब तक दीपक जलता है, वह गर्म रहता है | उससे हाथ जलने का खतरा होता है और इसीलिए उसे कोई नहीं छेड़ता | परन्तु जब दीपक बुझ जाता है, तो एक नन्हा सा बच्चा भी उसे उठाकर साइड में फेंक देता है | ठीक इसी प्रकार, जब तक हमारी आशा रुपी लौ जल रही है, हमें कोई महत्वहीन महसूस नहीं करवा सकता | भले ही हम जीवन में कठनाईयों से गुजर रहे हों, जीवन के न्यूनतम आर्थिक स्तर पर हों, हमारी नौकरी छुट गई हो, व्यवसाय में घाटा हो गया हो, उसके बावजूद अगर हमने उम्मीद नहीं खोई है तो हम फ़िर से नई ऊँचाइयों पर पहुँच सकते हैं | 

4. भले ही दीपक किसी कारण से बुझ जाए, पर अगर उसमें तेल भरा हुआ है तो उसे फ़िर से जलाया जा सकता है | उसी तरह, अगर हमारे भीतर भी इच्छाशक्ति रुपी तेल भरा हुआ है, तो आशा और अवसर रुपी माचिस से उसे पुनः प्रज्वलित किया जा सकता है | और जीवन को प्रकाशमय किया जा सकता है | लेकिन जिस आदमी में इच्छाशक्ति रुपी तेल ही ख़त्म हो जाता है, फ़िर भले ही उसे कितने अवसर दे दिए जायें, तो भी उसके भीतर आग नहीं जलाई जा सकती और उसके जीवन को दोबारा रोशन नहीं किया जा सकता |

इसलिए, सदैव अपने पारिवारिक और सामाजिक कर्तव्यों का निर्वहन करते रहिये, अपने महत्व को बनाये रखिये, अपने भीतर इच्छाशक्ति रुपी तेल को भरे रखिये, अपनी आशा रुपी लौ को जलाये रखिये, दूसरों की प्रगति में सहायक बनते रहिये, मुस्कुराइये और मुस्कुराहट बाँटते रहिये | और याद रखिये,

दीपक दूसरों से नहीं जलता, वह तो दूसरों के लिए जलता है |


सादर 


प्रवीण चौधरी 
अध्यक्ष, व्यापक फाउंडेशन 
praveen@vyaapak.org
WhatsApp : 8178983844
Telegram: @VyaapakFoundation

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