Tuesday, December 29, 2020

ज़िन्दगी की पाठशाला #5 - नूडल्स

 


नूडल्स (Noodles) हम सभी कभी न कभी खाते ही हैं, और बच्चों को तो यह बहुत पसंद होते हैं | आज जब बच्चों को नूडल्स खाते देखा, तो ज़िन्दगी की एक बड़ी सीख दे गए नूडल्स |

नूडल्स उलझे हुए रहते हैं और खाते समय एक बार में ही चम्मच या कांटे में भर कर आते हैं | कई बार मुँह से बाहर लटकते नूडल्स को कंट्रोल करना भी मुश्किल होता है, पर खाने में मज़ा बड़ा आता है | नूडल्स खाने का एक तरीका यह भी हो सकता है कि नूडल्स को एक–एक करके सुलझा कर खाया जाए | लेकिन एक-एक नूडल को सुलझाने में टाइम बड़ा लगेगा और खाने का मज़ा कहीं खो जाएगा | आप जानते हैं कि एक-एक नूडल खाने में इतना मज़ा नहीं आता जितना मुँह भर उलझी हुए नूडल्स खाने में आता है |

अब अगर ध्यान से देखें, तो हम सब की ज़िन्दगी भी कहीं न कहीं हमेशा नूडल्स की तरह उलझी रहती है | हम सब के जीवन में छोटी-बड़ी कोई न कोई समस्या बनी रहती है | ज़िन्दगी जीने का एक तरीका तो ये हो सकता है कि हर एक समस्या को हल करने की कोशिश की जाए | ज़िन्दगी जीने का दूसरा तरीका ये भी हो सकता है कि नूडल्स की तरह मुँह भर के खाया जाए और आनंद लिया जाए |

जिस प्रकार हर उलझी हुई नूडल को सुलझा पाना संभव तो है, पर उन्हें सुलझाने के चक्कर में बहुत समय लगेगा और नूडल्स ठंडी हो जायेंगी और खाने योग्य नहीं बचेंगी | मान लीजिये कि आप उन्हें खा भी लें, फ़िर भी एक बात तो तय है कि मज़ा नहीं आएगा | ठीक उसी तरह, माना कि जीवन की हर समस्या का कोई न कोई संभावित समाधान तो अवश्य है | पर अगर हर एक समस्या को सुलझाने बैठ गए तो आप समय के साथ नहीं चल पाएँगे, कहीं पीछे रह जाएँगे, और जीवन का भरपूर आनंद नहीं उठा पाएँगे | 

जैसे नूडल्स में ज़बरदस्त मसाला ना डाला जाए, तो बढ़िया वाला मज़ा नहीं आता | उसी तरह परेशानियाँ भी ज़िन्दगी में मसाले का काम करती हैं | अगर ज़िन्दगी में समस्याएँ और चुनौतियाँ न हों, तो ज़िन्दगी भी बेस्वाद लगती है | 

मेरे दोस्त, ज़िन्दगी तो हमेशा उलझी हुई नूडल्स की तरह ही रहेगी | अब आपको तय करना है कि सारा वक़्त इसे सुलझाने में लगाया जाए या मुँह भर के खाया जाए और इसका भरपूर आनंद उठाया जाए |  

एक बात कहूँ तो, मान लेना ईश्वर के वास्ते |

 श्रद्धा बनाये रखना, खुल जाएँगे बंद रास्ते ||

सादर 


प्रवीण चौधरी 
अध्यक्ष, व्यापक फाउंडेशन 
praveen@vyaapak.org
WhatsApp: 8178983844

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Wednesday, December 16, 2020

ज़िन्दगी की पाठशाला #4 - सड़क और गड्ढे


सड़क और गड्ढे एक दूसरे के पूरक हैं | सड़क पर गड्ढे बिलकुल वैसे ही होते हैं, जैसे किसी मासूम बच्चे को बुरी नज़र से बचाने के लिए उसके चेहरे पर काला टीका लगा दिया गया हो | सरकार चाहे कितने भी बढ़िया हाईवे बनवा दे, पर गड्ढे वाली सड़कों पर चलने का अपना अलग ही मज़ा है | वैसे भी हमारे देश में नई सड़क बनने के बाद, जानते है कि सबसे पहला काम क्या होता है, जी हाँ बिलकुल सही, उसे खोदने वाले चले आते हैं | कौन कहता है कि विभागों में समन्वय की कमी है, एक विभाग सड़क बनाता चलता है और दूसरा पीछे-पीछे उसे खोदता चलता है | अपने यहाँ तो एक मज़ेदार कहावत भी प्रचलित है कि:

यहाँ भी खुदा है, वहाँ भी खुदा है |
जहाँ आज नहीं खुदा है, वहाँ कल खुदेगा ||

बहरहाल, हम सब इस बात से परिचित है कि सड़को पर छोटे-बड़े, कभी-कभी बहुत बड़े, और कभी पानी भरे गड्ढे मिलना एक आम बात है | और हम सभी ने कभी न कभी इन्हें कूदकर पार करने का अनुभव भी किया होगा | कल मेरे साथ भी यही घटना घटित हुई | मैं पैदल ही बाज़ार की ओर जा रहा था कि अचानक से रास्ते में पानी से भरा एक बड़ा गड्ढा आ गया | चूँकि गड्ढा बड़ा था और उसमें पानी भरा था, इसलिए मुझे दो कदम पीछे हटकर तेजी से छलाँग लगा कर उसे पार करना पड़ा | मन में थोड़ा क्रोध आना भी स्वाभाविक था कि किसने सड़क पर इतना बड़ा गड्ढा खोद दिया | प्रशासन और सरकार  लापरवाह है आदि विचार भी मन में आने लगे | तभी मन में विचार आया कि चलो अच्छा हुआ कि छलाँग लगाने के बहाने थोड़ा व्यायाम हो गया | एक बात और दिमाग में आई कि ये गड्ढा तो दिख रहा था पर हमारे जीवन की राह तो न जाने कितने अदृश्य गड्ढों से भरी पड़ी है | कुछ लोग तो हमारी राह में कदम-कदम पर गड्ढे खोदने के लिए ही तैयार बैठे रहते हैं | 

तभी अचानक इस घटना का एक सकारात्मक पहलु भी समझ में आया और गुस्सा कहीं गायब हो गया |  जो लोग हमारी राह में गड्ढे खोदते हैं, वास्तव में वे हमें इस बात का अवसर देते हैं और प्रेरित करते हैं कि हम पूरी शक्ति के साथ साथ छलाँग लगा कर आगे बढ़ जायें | कभी कभार आपको थोड़ा रुकना, विचार करना, और दो कदम पीछे हटना भी पड़ सकता है | पर आखिरकार हम उस बाधा को पार कर ही लेते हैं | और इससे हमें अपनी वास्तविक शक्ति का आभास भी होता है |

तो आज के बाद जो लोग आपके रास्ते में गड्ढे खोदते हैं, आपको उनका धन्यवाद् देना चाहिये | क्योंकि ये आपको जीवन में ऊँची छलाँग लगाने का अवसर और साहस दे रहे हैं |

याद रखिये:

जो व्यक्ति आपकी पीठ पीछे बुराई करता है, वो आपसे दो कदम पीछे है |

जो व्यक्ति आपकी टांग खींचता है, उसका स्तर आपसे नीचे है |

और

जो व्यक्ति आपकी प्रतिष्ठा को ठेस पहुँचाने की कोशिश करता है, निश्चित ही उसकी प्रतिष्ठा आपसे कम है |

तो अगली बार जब आपको रास्ते में कोई गड्ढा मिले, तो गड्ढा खोदने वाले को धन्यवाद् दीजिये, और उसे कूद कर जीवन की राह पर आगे बढ़ जाइये | 


सादर 

प्रवीण चौधरी 
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Wednesday, September 30, 2020

परेशानियों से निपटने का 4P फ़ॉर्मूला | 4P Formula to handle problems in life


क्या आप परेशान हैं और आपको परेशानी से बाहर निकलने का कोई उपाय नहीं सूझ रहा है? कहते हैं कि जीवन है, तो परेशानियाँ हैं | जीवन में परेशानियाँ आना स्वाभाविक है, बल्कि यूँ कहें कि परेशानियाँ हमारे जीवन का एक अभिन्न भाग हैं | हम में से शायद कोई भी ऐसा नहीं होगा जिसके जीवन में छोटी-बड़ी कोई भी समस्या न हो | जीवन एक बाधा दौड़ की तरह है, जिसमें हर मोड़ पर एक नई चुनौती हमारा इंतज़ार कर रही है |

दोस्तों, यह बात भी सही है कि जीवन की हर बाधा को पार करते हुए ही हमें अपने लक्ष्य पर पहुँचना होता है | आप किसी भी सफल व्यक्ति के बारे में पढ़ लीजिये और आप पायेंगे कि सभी की ज़िन्दगी में परेशानियाँ आई थीं | बहरहाल, आज हम दूसरों की नहीं बल्कि हमारी खुद की परेशानियों की बात करेंगे |

जब भी हमें ज़िन्दगी में कोई परेशानी आती है, तो सबसे पहले हम खुद ही उसे हल करने की कोशिश करते हैं | पर कई बार जब हमें समस्याओं का कोई हल नहीं मिलता, तो हम धीरे-धीरे मानसिक दबाव में आ जाते हैं | कई बार तो यह दबाव इतना बढ़ जाता है कि कुछ लोग आत्महत्या तक कर बैठते हैं | यहाँ पर एक बात को समझना बहुत ज़रूरी है कि जिस प्रकार हर ताले की एक चाबी होती है | उसी तरह जीवन की हर समस्या का कोई न कोई समाधान ज़रूर होता है | सुनने में यह बात थोड़ी किताबी ज़रूर लगती है, पर सार्थक है | 

यदि खुद से प्रयास करने पर भी आपको समस्या का कोई हल नहीं मिल पा रहा है, तो आप परेशानियों से निपटने के लिए 4P फार्मूला का इस्तेमाल करें |  

4P फार्मूला परेशानियों से निपटने की एक चरणबद्ध प्रक्रिया (Step by step process) है, जिसमें निम्नलिखित चार चरण हैं :


#1 परिवार (Family)
जब आपको समस्या का कोई समाधान न मिल पा रहा हो, या आपके पास समस्या के हल के रूप में कई विकल्प हों, और आपको यह समझ ना आ रहा हो कि कौन से विकल्प को चुना जाए, तो सबसे पहले अपने परिवार से सलाह लीजिये | यकीन मानिये, आपके बाद आपका परिवार ही है जिसे आपकी समस्या को सुलझाने में रुचि होती है | आप अपने घर के बड़ों, माता-पिता, भाई-बहन, या अगर आप विवाहित हैं तो अपनी पत्नी/पति से सलाह ले सकते हैं | जीवन की ज्यादातर समस्याएँ पारिवारिक स्तर पर ही सुलझ जाती हैं |
 
#2 परिचित (Friends/Relatives/Known)
अगर आपको अपने परिवार से भी अपनी परेशानी का कोई हल नहीं मिल पा रहा है, तो आपको अपने दोस्तों, सगे-संबंधियों और अपने जान-पहचान वालों से भी अपनी समस्या हो साझा करना चाहिये और उनकी मदद या राय लेनी चाहिये | कई बार हमें संकोच होता है कि मेरे दोस्त या रिश्तेदार मेरे बारे में क्या सोचेंगे? क्या वो मेरी मदद करेंगे? वो मेरा मज़ाक तो नहीं उड़ायेंगे? यदि आपके मन में भी इसी तरह की शर्म या संकोच है, तो मैं आपसे कहना चाहूँगा कि बहुत से लोग आपकी मदद करेंगे या आपको सही सलाह देंगे | अगर आमने-सामने बात करने में झिझक हो रही है तो फ़ोन पर बात कीजिये | जब मुझे किसी से कोई मदद की ज़रुरत होती है तो मैं सीधे कहता हूँ कि मुझे आपकी मदद/राय चाहिये | ज्यादा से ज्यादा सामने वाला आपको मना ही कर देगा | पर अगर आप बात ही नहीं करेंगे तो उत्तर हमेशा "ना" ही होगा | इससे पहले कि आपकी समस्या धीरे-धीरे और गहराती चली जाए, उसे अपने दोस्तों और परिचितों के साथ शेयर कीजिये |
   
#3 परामर्शदाता (Expert/Mentor/Guru)
अगर आपकी परेशानी किसी विशेष क्षेत्र से जुड़ी हुई है, जैसे कोई टेक्निकल, कानूनी, शारीरिक, मनोवैज्ञानिक समस्या है, जिसका समाधान आपको परिवार या मित्रों से नहीं मिल पा रहा है तो आप उस क्षेत्र के किसी विशेषज्ञ के पास जाइये | यह एक्सपर्ट कोई डॉक्टर, वकील, या परामर्शदाता हो सकता है | आप अपनी परेशानी के हिसाब से अपने किसी गुरु के पास भी जा सकते हैं | तो जाइये और उनसे मिलिए, विस्तार से अपनी परेशानी बताइये, और अपनी समस्या को सुलझाने में उनकी मदद लीजिये | 

#4 परमात्मा (Bhagwan/God/Almighty)
कई बार हमें चारों ओर निराशा का घनघोर अँधेरा दिखाई देता है, और परेशानी से निकलने का कोई रास्ता दिखाई नहीं देता | यदि किसी कारण से अभी भी आपको आपकी समस्या का हल नहीं मिल पा रहा है, तो निराश मत होईये, परमात्मा की शरण में जाइये | मुझे विश्वास है कि हम में से हर कोई परमात्मा को किसी न किसी रूप में ज़रूर मानता है, फ़िर चाहे वो प्रकृति के रूप में ही क्यों न हो? उस सर्वशक्तिमान का सहारा लीजिये | परमपिता परमेश्वर आपको वो रास्ता ज़रूर दिखायेंगे जो आपको आपकी समस्या के समाधान की ओर ले कर जाये | चमत्कार इसी दुनिया में होते हैं, और आपके साथ भी कोई न कोई चमत्कार अवश्य घटित होगा | पर चमत्कार घटित होने के लिए आपके मन में उत्साह, दृढ़ विश्वास, और श्रद्धा का होना आवश्यक है | कहते है कि भगवान भी उन्हीं की मदद करते हैं जो अपनी मदद स्वयं करते हैं | भगवान का नाम लीजिये और पूरे मन से अपने कर्म कीजिये, भगवान आपकी सहायता अवश्य करेंगे |

वैसे अगर आप यह आशा कर रहे हैं कि जीवन में कभी कोई समस्या आए ही नहीं, तो आपकी अपेक्षा गलत है | जीवन में समस्याओं का भी वैसा ही महत्व है, जैसा कि भोजन में नमक और मसालों का | हमारी ज़िन्दगी एक ई.सी.जी. ग्राफ की तरह होती है | जब तक ग्राफ ऊपर नीचे जाता रहता है, तब तक हमारा दिल काम करता रहता है | लेकिन जैसे ही एक सीधी रेखा दिखाई देने लगती है, तो हृदय काम करना बंद कर देता है और जीवन का अंत हो जाता है | उसी प्रकार, अगर जीवन में उतार चढ़ाव नहीं होंगे, परेशानियाँ नहीं होंगी, तो जीवन नीरस हो जायेगा |

यह जीवन एक लड़ाई का मैदान है, हर लड़ने वाला यहाँ परेशान है |
लड़ना भी अंतिम साँस तक है, क्योंकि विश्रामस्थल तो बस शमशान है ||

तो जीवन में मस्त रहिये, व्यस्त रहिये, पर अस्त-व्यस्त मत रहिये | 

सादर 

प्रवीण चौधरी 
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Monday, September 28, 2020

जीवन में असफलता का #1 कारण | #1 Reason to failure in life


क्या आप जानते हैं कि जीवन में ज्यादातर लोग सफल क्यों नहीं हो पाते? क्या आप अपने जीवन में सफल होना चाहते हैं? यही आपका उत्तर हाँ है, तो पहले बताइये कि आपकी नज़र में सफलता क्या है? यदि यही प्रश्न बहुत से लोगों से पूछा जाए तो हमें बहुत से अलग-अलग उत्तर मिलेंगे | एक व्यक्ति के लिए जो सफलता है, हो सकता है एक दूसरे व्यक्ति के पास वो पहले से ही प्रचुर मात्रा में हो, और वो अपने को सफल बनाने के लिए किसी अन्य लक्ष्य को प्राप्त करना चाहता हो |

कहने का अर्थ यह है कि हर व्यक्ति विशेष के लिए सफलता की परिभाषा अलग-अलग होती है | यदि आप वास्तव में सफल होना चाहते हैं तो आपको सबसे पहले अपनी सफलता की परिभाषा को तय करना होगा | मतलब वो कौन सी वस्तु या स्तिथि है, जिसे प्राप्त करके आप अपने को सफल महसूस करेंगे | हम में से ज्यादातर लोग ज़िन्दगी में ये तय ही नहीं कर पाते कि आखिर उन्हें क्या चाहिये? 

जीवन में असफ़लता का सबसे बड़ा कारण 

आपने कई बार लोगों को यह सलाह देते सुना होगा कि "तुम आदमी तो मेहनती हो, पर तुम्हारी लाइन ठीक नहीं है" | जानते हैं कि इसका मतलब क्या है? इसका सीधा सा मतलब है कि जिस रास्ते पर आप चल रहे हो, उस पर चलकर आप अपनी मनचाही मंजिल पर नहीं पहुँच पाएँगे | मैं यह नहीं कह रहा कि आप कहीं नहीं पहुँच पाएँगे | आप कहीं न कहीं तो ज़रूर पहुँच ही जायेंगे, पर वहाँ नहीं पहुँच पाएँगे जहाँ आप पहुँचाना चाहते थे |



आइये, इसे एक उदाहरण से समझते हैं | मुझे विश्वास है कि हम सभी ने कभी न कभी किसी बड़े रेलवे जंक्शन से ट्रेन ज़रूर पकड़ी होगी | मान लीजिये कि आप नई दिल्ली रेलवे स्टेशन पर पहुँचे | नई दिल्ली एक बड़ा रेलवे स्टेशन है, जहाँ से अलग अलग जगहों के लिए ट्रेन मिलती है | मान लीजिये कि आपको मुंबई जाना है, और आप गलती से कोलकाता जाने वाली ट्रेन में बैठ गए | आपने ट्रेन में बैठने से पहले किसी से नहीं पूछा कि क्या यह ट्रेन मुंबई जाएगी? आप इस ट्रेन में बैठकर सोच रहे हैं कि आप एक निश्चित समय में मुंबई पहुँच जायेंगे | 

कुछ घंटों के सफ़र के बाद आपको इस बात का एहसास होता है कि आप गलत ट्रेन में बैठ चुके हैं | आपके पास अभी भी विकल्प है कि आप एक अमुक स्टेशन पर उतर कर मुंबई के लिए एक दूसरी ट्रेन पकड़ लें | कभी-कभी ऐसा भी हो सकता है कि आपको वापिस नई दिल्ली आना पड़े और फ़िर मुंबई के लिए ट्रेन मिले | आश्चर्य कि बात यह है कि कई बार ये जानने के बाद भी कि यह ट्रेन आपके लिए गलत है, आप उसी ट्रेन में बैठे रहते हैं | आप दुविधा में रहते हैं और ट्रेन बदलने का साहस नहीं कर पाते | आप ऐसे लोगों की तलाश में रहते हैं जो शायद आपकी बात का समर्थन करें कि आप सही ट्रेन में बैठे हैं |

दोस्तों, सही ट्रेन में न बैठना, सही मार्ग पर न चलना, और गलती का पता चलने पर भी उसे न सुधारना ही हमारी सबसे बड़ी भूल है | क्या यह ठीक न होता कि ट्रेन में बैठने से पहले ही आपने सुनिश्चित कर लिया होता कि आप सही ट्रेन में बैठ रहे हैं | किसी जानकार व्यक्ति से पूछ लिया होता | ज्यादातर लोग तो गलती का पता चलने पर भी ट्रेन से इसलिए नहीं उतर पाते कि दूसरे लोग क्या कहेंगे, वे आपका मज़ाक उड़ायेंगे |  

आप शायद अब तक समझ गए होंगे कि ट्रेन और रास्ते से मेरा इशारा किस ओर है | जी हाँ, बिलकुल सही, मैं ज़िन्दगी में हमारी मंजिल, वहाँ तक पहुँचने के रास्ते और हमारे प्रयासों की ही बात कर रहा हूँ | हमारे करियर के शुरूआती दौर में हम अपने आप को नई दिल्ली रेलवे स्टेशन पर खड़ा पाते हैं | जहाँ पर हमारे पास अलग-अलग मंजिलों पर पहुँचने के लिए अलग-अलग रास्ते हैं |  विडंबना यह है कि अधिकतर लोग अनजाने में, दूसरों की देखा-देखी, दूसरों की गलत सलाह पर, या लोगों के प्रभाव में आकर गलत लाइन पकड़ लेते हैं और गलत ट्रेन में बैठ जाते हैं | फ़िर ये शिकायत करते हैं कि मैं पूरी मेहनत कर रहा हूँ, अपना 100 प्रतिशत दे रहा हूँ, पर सफलता प्राप्त नहीं हो पा रही | ज़रा सोचिये, कोलकाता वाला रास्ता आपको मुंबई कैसे ले जा सकता है | मुंबई पहुँचने के लिए तो मुंबई का ही रास्ता पकड़ना पड़ेगा | 

यदि आप अपने करियर के रेलवे स्टेशन पर खड़े हैं और किसी ट्रेन में बैठने जा रहे हैं, तो ट्रेन में बैठने से पहले यह सुनिश्चित कर लें कि वह ट्रेन और रास्ता दोनों आपके लिए सही हैं | यदि आपको यह अहसास हो रहा है कि आप गलत ट्रेन में सफ़र कर रहे हैं, तो दूसरों की परवाह किये बगैर अपनी ट्रेन बदलिए और उस ट्रेन में बैठिये जो आपके लिए सही है | जो आपको आपकी मनचाही मंजिल तक पहुँचा सकती है |

कहते हैं कि "दुनियाँ का सबसे बड़ा रोग, क्या कहेंगे लोग?" | लोगों की फ़िक्र छोड़िए, ये आपकी ज़िन्दगी है और जो रास्ता आपके लिए सही है उसे चुनिए और आगे बढ़िये......



सादर 
प्रवीण चौधरी 
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Thursday, September 17, 2020

ज़िन्दगी की पाठशाला #3 - पानी का गिलास


आज का पाठ काफी मज़ेदार और महत्वपूर्ण है | मैं अपने ड्राइंग रूम में बैठा हुआ था और मुझे प्यास लगी | मैंने मेज पर रखे पानी के जग से गिलास में पानी डालना शुरू किया, तभी अचानक टेलीविज़न पर कोई ज़रूरी खबर आ गई | मेरा ध्यान ज़रा सा चूका ही था कि गिलास पूरा भर गया और पानी नीचे गिरने लगा | मैंने तुरंत जग को सीधा कर टेबल पर रख दिया | अब मैं ऊपर तक पानी से भरे गिलास और मेज पर फैले अतिरिक्ति पानी को देख रहा था | कोई घटना घटे और हमें कुछ सीख न दे, यह कैसे हो सकता है?

मेरे मन में विचार आया कि यह पानी गिलास से बाहर क्यों निकला? शायद इसलिए कि वह गिलास पूरा भर चुका था | अब और अधिक समाहित करने की क्षमता उसमें नहीं थी | पहले गिलास स्वयं पानी से भर गया, उसके बाद ही उसने पानी को बाहर छलकाना शुरू किया | अगर उसमें शरबत या शराब होती, तो भी क्या पूरा भर जाने पर बाहर छलकती? शायद आप कहेंगे, "हाँ", इसमें विशेष क्या है? साधारण सी बात है, जब कोई पात्र किसी पदार्थ से पूर्णतया भर जाता है तो वह अतिरिक्त पदार्थ को बाहर छलकाना शुरू कर देता है | बात तो साधारण सी है, पर इसका सन्देश बड़ा गहरा है | 

"जो भीतर भरा है, वही तो बाहर छलकेगा"

यही नियम हमारे व्यक्तित्व, हमारे जीवन पर भी लागू होता है | हमारे व्यक्तित्व से वही प्रदर्शित होता है, जो हमारे भीतर भरा है | हम जीवन में दूसरों के साथ वही साझा करते हैं, जो हमारे पास है | जो हमारे अन्दर भरा हुआ है, वही हमारे व्यवहार के माध्यम से बाहर छलकता है |

ध्यान दीजिये 

क्रोध से भरे व्यक्ति का क्रोध छलकता है |

प्रेम से भरे व्यक्ति का प्रेम छलकता है |

भावनाओं से भरे व्यक्ति के आँसू छलकते हैं |

कुंठा से भरे व्यक्ति की कुंठा छलकती है |

करुणा से भरे व्यक्ति की करुणा छलकती है |

और 

ज्ञान से भरे व्यक्ति का ज्ञान छलकता है |  

दोस्तों, यहाँ पर दो बातें ध्यान देने वाली और महत्वपूर्ण हैं: 

पहली, "केवल भरा हुआ पात्र ही छलकता है" | सोचिये, जो हमारे पास है ही नहीं, वह हम दूसरों को कैसे दे सकते है | हम दूसरों को केवल वही दे सकते हैं जो हमारे पास है, और पर्याप्त मात्रा में है | याद रखिये, "केवल भरा हुआ पात्र ही छलकता है" |   

दूसरी, "जो भीतर भरा है, वही बाहर छलकता है" | पात्र के पूर्णतया भर जाने पर जो भीतर है, केवल वही पात्र से बाहर छलकता है | जिस प्रकार पानी से भरे पात्र से केवल पानी ही बाहर छलकेगा, दूध नहीं | उसी प्रकार क्रोध से भरे व्यक्ति से केवल क्रोध ही छलकेगा, प्रेम नहीं |

इसलिये, जीवन की इस भाग दौड़ में तनिक रुकिए और सोचिये कि आपके भीतर क्या भरा हुआ है | क्योंकि जो भीतर है, प्रचुरता होने पर वही बाहर छलकेगा, वही आप दूसरों के साथ साझा कर पायेंगे, और वही आपके व्यक्तित्व को आकार देगा | इसलिये, जीवन के प्रति सदैव सजग रहिये......... 


सादर 
प्रवीण चौधरी 
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Sunday, September 6, 2020

ज़िन्दगी की पाठशाला #2 - सुबह की सैर

 


ज़िन्दगी बड़ी बेरहम टीचर है जो सुबह उठने के साथ ही सिखाना शुरू कर देती है | हर दिन की तरह आज भी जब मैं सुबह की सैर (morning walk) पर गया, तो ज़िन्दगी ने एक नया पाठ पढ़ा दिया | यहाँ आपको बता दूँ कि जिस रास्ते पर मैं घूमने जाता हूँ, वह रास्ता थोड़ा ख़राब है और जगह-जगह कंकड़ पत्थर पड़े रहते हैं | चूँकि चलने में थोड़ा कष्ट होता था, इसलिए मैंने कुछ दिन पहले ही एक जोड़ी नये और आरामदायक जूते खरीद लिए | नये जूते पहन कर चलने में आराम रहता है और अगर कोई कंकड़ पत्थर पैर के नीचे आ जाये तो पता भी नहीं चलता | 

आज सुबह सैर करते समय एक कंकड़ कहीं से उछल कर मेरे जूते के अन्दर आ गया, और बहुत ज़ोर से चुभने लगा | चुभन इतना ज्यादा थी कि दो कदम आगे बढ़ना भी मुश्किल हो गया | मुझे वहीं पर रुक कर जूता उतारना पड़ा और कंकड़ बाहर निकालना पड़ा | तब जा कर कहीं राहत मिली | 

लेकिन जैसा कि मैं हमेशा कहता हूँ कि ज़िन्दगी कोई मौका नहीं चूकती है, वो तो कदम-कदम पर आपको पाठ पढ़ाती रहती है | ज़िन्दगी धीरे से एक और पाठ पढ़ा गई कि चाहे राह में कितने ही कंकड़ पत्थर क्यों न हों, पर अगर आपने एक आरामदायक जूते पहने हैं, तो आपको परेशानियों का अहसास भी नहीं होगा | या यूँ कहें कि राह के काँटे आपको कष्ट नहीं दे पायेंगे | इसके विपरीत आपने कितने भी महँगे और आरामदायक जूते क्यों न पहने हों, लेकिन अगर एक छोटा सा भी कंकड़ आपके जूते के अन्दर चला जाता है, तो चलना लगभग नामुमकिन हो जाता है |

इसी तरह हमारी ज़िन्दगी की राह में परेशानियों और चुनौतियों रुपी कितने भी कंकड़ पत्थर क्यों न हों | अगर हमने आत्मविश्वास, श्रद्धा, और समर्पण रुपी जूते पहने हुए हैं तो हम अपने लक्ष्य की ओर आगे बढ़ते जाते हैं | लेकिन जब हमारे जूतों में शंका और निराशा जैसे कंकड़ आ जाते हैं, तो दो कदम आगे बढ़ना भी मुश्किल हो जाता है | 

दोस्तों, आप अपने परिवार, मित्रों और शुभचिंतकों को भी इन जूतों के रूप में समझ सकते हैं, जो हमेशा आपको बाहरी चुनौतियों से लड़ने में मदद करते हैं | लंकापति रावण ने भी प्रभु श्रीराम से यही कहा था कि "तुम इसलिए जीत गए कि तुम्हारा भाई तुम्हारे साथ था, और मैं इसलिए हार गया कि मेरा भाई मेरे विरुद्ध था |" 

आज की इस घटना से हमें एक सीख यह भी मिलती है कि हम बाहरी चुनौतियों का सामना तो कर सकते हैं, पर आम तौर पर अपने भीतर की कमियों के कारण हार जाते हैं | जीवन में महत्वपूर्ण यह नहीं है कि मैं कल कितना बेहतर प्रदर्शन करूँगा | बल्कि महत्वपूर्ण तो यह है कि क्या मैं आज, कल से बेहतर प्रदर्शन कर पा रहा हूँ |

इसलिए, अपने आत्मविश्वास रुपी जूते कसिये, श्रद्धा रुपी हवा की एक गहरी साँस लीजिये और पूरे उत्साह के साथ अपने लक्ष्य की ओर आगे बढ़िये..........


सादर 

प्रवीण चौधरी 
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Saturday, August 29, 2020

ज़िन्दगी की पाठशाला #1 - अंगूर का दाम

 


भले ही लॉकडाउन की वजह से स्कूल बंद चल रहे हैं, पर सबसे बड़ा स्कूल, जी हाँ, “जीवन की पाठशाला” तो हर दिन खुली है | सही कहते हैं कि ज़िन्दगी तो हमें हर दिन हर पल कुछ नया सिखाती है, बशर्ते कि हम अपने दिमाग के दरवाजे खुले रखें और सीखने के लिए तैयार रहें |

ए ज़िन्दगी तेरी पाठशाला में पढ़ते पढ़ते, अब तो मेरी उम्र हो चली |

न तो कभी कोर्स ही पूरा हुआ, और न कभी कोई छुट्टी ही मिली ||  

आज बाज़ार से अंगूर खरीदते समय जीवन की एक नयी सीख मिली | जब दुकानदार से पूछा कि भाई अंगूर किस भाव दिये हैं, तो वो बोला कि “साहब, 90 रुपये किलो” | साथ वाली टोकरी में अंगूर के टूटे हुए दाने पड़े थे, जो ताजे और साफ़ दिख रहे थे | 

मैंने पूछा कि “इनका क्या रेट है?”

दुकानदार बोला कि “ले लीजिये, 40 रुपये किलो लगा दूँगा” |

मैंने पूछा कि "इनका इतना कम दाम क्यों?"

वो बोला कि “साहब, हैं तो ये भी बहुत बढ़िया, पर क्या है न कि, अपने गुच्छे से टूट गए हैं |”

शायद उस दुकानदार के लिए यह एक साधारण बात थी, पर आज वो ज़िन्दगी की एक बेहतरीन सीख दे गया | अंगूर वही हैं, पर जब तक एक साथ एक गुच्छे में बंधे हैं, तब इनकी कीमत 90 रुपये किलो है | अपने गुच्छे से टूटकर अलग हो जाने पर उन्हीं अंगूरों की कीमत मात्र 40 रुपये रह जाती है | 

इस घटना का हमारे जीवन से बड़ा गहरा सम्बन्ध है | मुझे यह बात समझते देर ना लगी कि जब तक हम हमारे अपनों के साथ जुड़े रहते हैं, तब तक हमारी शक्ति और महत्व बना रहता है | लेकिन जब हम अपने परिवार और समाज से अलग हो जाते हैं, तो हमारी कीमत आधे से भी कम रह जाती है |

इसलिए, अपने परिवार, मित्रों और समाज से हमेशा जुड़े रहिये |


सादर 

प्रवीण चौधरी 
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