Tuesday, February 9, 2021

ज़िन्दगी की पाठशाला #7 - दर्पण



पिछले सप्ताह एक मित्र के घर उनके बेटे के जन्मदिवस समारोह (Birthday party) में जाना हुआ | पार्टी घर पर ही आयोजित की गई थी और मेहमानों की संख्या भी बहुत अधिक नहीं थी, जिनमें बड़ों की अपेक्षा बच्चों की संख्या ज्यादा थी | बच्चे इधर उधर उछल-कूद कर रहे थे और खूब धमाल मचा रहे थे | 

मेरे दोस्त को घर में सजावटी सामान सजाने का बहुत शौक है | हॉल के एक कोने में एक बहुत ही सुन्दर और स्टाइलिश दर्पण (Mirror) रखा हुआ था | उस दर्पण ने वहाँ उपस्थित ज्यादातर लोगों का ध्यान अपनी ओर आकर्षित किया | दर्पण वास्तव में बहुत सुन्दर और आकर्षक था | मेरे दोस्त ने कई बार बच्चों को उस दर्पण से दूर रहने को कहा | उसने एक गाना चला दिया और सभी बच्चे डांस करने लगे | मैं भी हल्का फुल्का नाश्ता (Snacks) खाते हुए अपने दोस्त से बातें करने लगा | 

तभी अचानक से एक ज़ोरदार आवाज हुई | दुर्भाग्य, जिस बात का डर था आखिर वही हुआ | वह सुन्दर और मनमोहक दर्पण टूट गया और फर्श पर दूर दूर तक काँच के टुकड़े बिखर गए | मेरा दोस्त जोर से चिल्लाया "अरे, ये किसने कर दिया?" सभी लोग एकदम शांत हो गए पर आसपास खड़ा कोई भी व्यक्ति इस घटना की ज़िम्मेदारी लेने को तैयार नहीं था | शायद नाचते समय कोई बच्चा उस दर्पण से टकरा गया था | बहरहाल, शीशा टूट चुका था और उसके टुकड़े लगभग पूरे फर्श पर फ़ैल चुके थे | मेरा दोस्त गुस्से से आग बबूला हुआ जा रहा था | शायद दर्पण काफी महँगा था और मेरे दोस्त को बहुत प्रिय था | तभी भाभी जी ने बात सँभालते हुए कहा कि चलो कोई बात नहीं | जो होना था सो हो गया | किसी को काँच लग न जाए | बच्चों तुम लोग साइड से थोड़ा बच कर आना | वहाँ उपस्थित लगभग सभी लोग काँच के टुकड़ों से बच बच कर चलने लगे | 

जैसा कि हमेशा होता है, इस घटना ने भी जीवन का एक बड़ा पाठ पढ़ाया | जो दर्पण थोड़ी देर पहले तक सभी के आकर्षण का केंद्र बना हुआ था, टूट जाने के बाद लोग उसी से दूर हो गए और बचकर चलने लगे | अब कोई उसके पास नहीं आना चाहता, बल्कि इस बात से डरता है कि उस टूटे हुए दर्पण से कहीं स्वयं को कोई नुकसान न हो जाए |

क्या असल ज़िन्दगी बिल्कुल इस दर्पण की तरह नहीं है? जब तक आप स्वस्थ हैं, समृद्ध है, संपन्न हैं, सुन्दर हैं, आकर्षक हैं, सफल हैं और प्रभावशाली हैं, तब तक हर कोई आपकी प्रशंसा करता है, आपका सम्मान करता है, आपके पास आना चाहता है और आपसे जुड़े रहना चाहता है | परन्तु जब ज़िन्दगी के थपेड़ों से आप टूट जाते हैं, तो वही लोग जो कल तक आपके पास आना चाहते थे, वे आपसे दूरी बनाना शुरू कर देते हैं | आप जब टूट जाते हैं, तो लोग आपसे बचना शुरू कर देते हैं | अरे साहब, अपनी छोड़िए, आप तो फ़िर एक इंसान हैं, दुनियाँ तो इस हद तक स्वार्थी हो गई है कि टूट जाने पर तो भगवान को भी घर से बाहर रख देती है |

अब यक्ष प्रश्न यह उठता है कि ज़िन्दगी के उतार चढ़ाव में जब कभी भीतर से टूट जाएँ, तो क्या करें? चुनौतियाँ हर इंसान के सामने आती हैं, उतार-चढ़ाव हर आदमी झेलता है | आप भले ही भीतर से टूट चुके हों, पर अपने आप को बिखरने न दें | जब भी ज़िन्दगी में ऐसा वक्त आए, तो दर्पण की कहानी को याद करें | दर्पण टूटकर भी हर टुकड़े में सही प्रतिबिम्ब दिखाता है, मुस्कुराता है, अपना वास्तविक काम किए जाता है और कहता है :

 दर्पण की व्यथा 
कल जब मैं दर्पण था 
तो लोगो देख देख कर जाते थे 
आज जब मैं टूट गया 
तो लोग बच बच कर जाते हैं 
कोई बात नहीं मेरे दोस्त
दिन सबके आते हैं 

 

सादर 


प्रवीण चौधरी 
अध्यक्ष, व्यापक फाउंडेशन 
praveen@vyaapak.org
WhatsApp : 8178983844
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